देश में इंटरनेट एवं मोबाइल फोंस का उपयोग हर दिन बढ़ रहा है। देश में इंटरनेट डाटा के खर्च में पिछले कुछ वर्षों में बेहद तीव्र गति से बढ़ोत्तरी हुई है। लोगों का अधिकतर समय अब इंटरनेट पर ही बीत रहा है। इसमें भी ज्यादातर ऑनलाइन वीडियो देखने में। लेकिन जरूरत से ज्यादा ऑनलाइन वडियो स्ट्रीमिंग अब हमारे ग्रह के लिए काफी खतरनाक साबित हो रहा है। इसको लेकर एक अध्ययन किया गया, जिसमें काफी रोचक एवं महत्वपूर्ण खुलासे हुए है। इसके बाद से अब ऑनलाइन वीडियो देखने में संयम पर खास जोर दिया जा रहा है। ताकि धरती को बीमार होने से बचाया जा सके।

फ्रेंच थिंक टैंक द शिफ्ट प्रोजेक्ट की ओर से बीते गुरुवार को एक अध्ययन जारी किया गया। इसके तहत ऑनलाइन वीडियो जैसे नेटफ्लिक्स, यूट्यूब वीडियो, सोशल मीडिया और हां, पोर्नोग्राफी देखने से हो रहे कार्बन उत्सर्जन को मापा गया।

पिछले कुछ वर्षों में ऑनलाइन और मोबाइल वीडियो उपयोग में अत्यंत तीव्र गति से वृद्धि हुई है। आने वाले वक्त में ये और बढ़ता ही रहेगा। बता दें, ऑनलाइन ट्रैफ़िक का 60 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ वीडियो स्ट्रीमिंग से ही आता है। लेकिन यह हमारे ग्रह के लिए खतरनाक होता जा रहा है, जो कि अच्छा नहीं है।


आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि कुल कार्बन उत्सर्जन का एक प्रतिशत उत्सर्जन सिर्फ और सिर्फ ऑनलाइन विडियो के चलते होता है। थिंक टैंक की गणना के अनुसार, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का एक प्रतिशत अकेले ऑनलाइन वीडियो (या प्रति वर्ष 300 मिलियन टन सीओ 2) के चलते होता है। इसमे लगभग एक तिहाई योगदान टीवी शो (जैसे नेटफ्लिक्स, एचबीओ जीओ, और अमेज़ॅन प्राइम) स्ट्रीमिंग से था। और एक अन्य एक तिहाई अश्लील साहित्य से था। एक प्रतिशत बहुत ज्यादा नहीं लग रहा होगा। लेकिन ये कई देशों के कुल कार्बन उत्सर्जन के लगभग बराबर है। 

स्ट्रीमिंग वीडियो ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कैसे करता है? वास्तव में आपका डिवाइस इंटरनेट से कनेक्ट होता है। फिर डेटा सर्वर से कनेक्ट होता है। जहां वीडियो संग्रहीत होता है। डेटा सर्वर को भारी मात्रा में ऊर्जा की जरूरत होती है। साथ ही, वीडियो फाइलें आमतौर पर बड़ी होती हैं। और हम बहुत से विडियो स्ट्रीम करते हैं। जो सामान्य इंटरनेट ब्राउजिंग की तुलना में अधिक डेटा खाते हैं। जो ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन करते हैं।

शिफ्ट प्रोजेक्ट एक ब्राउज़र प्लगइन का उपयोग करने की सिफारिश करता है। यह आपकी इंटरनेट गतिविधि से जुड़े बिजली और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को मापने के लिए होगा। इसके अलावा वेब पर विडियो अपलोड करने पहले उसके आकार को कम करने (लेकिन गुणवत्ता बनाए रखने) और उसे संपीड़ित करने की विशेष वकालत करते हैं।

थिंक टैंक डिजिटल संयम पर खास जोर देता है। इसका सीधा मतलब आपके डिजिटल व्यवहार को जलवायु के और अधिक अनुकूल बनाना है। इसी तरह ऑनलाइन वीडियो स्ट्रीमिंग के लिए समय सीमा में कमी करने सहित हर दो साल में नया फोन नहीं खरीदने के लिए भी खास ध्यान दिलाता है।

थिंक टैंक का अध्ययन का बड़ा हिस्सा वास्तव में ये था कि यह किसी एक विशिष्ट आदत के बारे में ही नहीं है। बल्कि यह अध्ययन अन्य पहलुओं पर भी काफी उपयोगी है। इससे पता चलता है कि प्रत्येक व्यक्ति पर्यावरण पर कितना और कैसा प्रभाव डाल सकता है। इसी तरह हमारे व्यवहारों का मूल्यांकन करने के लिए भी यह अध्ययन उपयोगी है। इन सबके बाद अब आपको निर्णय लेना है कि आप किस तरह, कैसे और कहां बदलाव कर सकते हैं।

तो शायद अगली बार जब आप ऑनलाइन वीडियो देखने की सोचें तो जलवायु परिवर्तन के बारे में भी खयाल रखेंगे।