आज से लगभग 10 से 15 साल पहले तक आपने अपने गांवों में अकसर ऊंचे पेड़ों जैसे ताड़ वगैरह पर गिद्ध पक्षी को देखा होगा। लेकिन अब वे वहां पर नजर नहीं आते। बल्कि ये कहें कि अब पूरे इलाके में ही गिद्धों की प्रजाति गायब हो चुकी है। ये कोई आम बात नहीं है। बल्कि ये आपके गांव या क्षेत्र के पर्यावरण, जैव विविधता सहित खाद्य की कड़ी को भी दर्शाता है। या यूं कहें कि खाद्य श्रृंखला की एक कड़ी अब बहुत तेजी से समाप्त हो रही है। अधिकतर इलाकों में तो ये हो भी चुका है। जिम्मेदार लोगों की नींद भी तब टूटी जब बहुत नुकसान हो चुका था। अब तो स्थिति ये है कि गिद्ध जैसी शानदार प्रजाति पर विलुप्ति का खतरा बहुत ज्यादा बढ़ गया है। गिद्धों के अचानक गायब होने के कई कारण हैं। आधुनिकीकरण का भी इसमें बहुत बड़ा हाथ है। जिसकी लाभार्थी हम इंसान ही है। और इससे नुकसान झेलने वाला पक्षी गिद्ध है, जो अब लगभग गायब हो चुका है। अनुमान है कि 1952 से अबतक गिद्धों की संख्या लगभग 99 प्रतिशत तक कम हो चुकी है।

अब ताड़ के वे पेड़ भी कहां
बचपन में जब मैं गांव में रहता था। तब हमारे गांव में बहने वाली नदी के किनारों पर और खेतों के आसपास बहुत सारे ताड़ के पेड़ खड़़ थे। बचपन में बारिश के दिनों में हम इन ताड़ के पेड़ों के नीचे इसके फल को ढूंढा करते थे। हमारी किस्मत कभी कभार अच्छी होती थी तो फल मिल भी जाता था। जिसे हम बड़े चाव से खाते थे। लेकिन अब तो ये पेड़ या तो खेती के लिए काट दिए गए या फिर स्वयं टूट कर गिर गए। ताड़ के नए पेड़ स्वंय प्राकृतिक रूप से ही उगे थे। तो लोग फिर से इसे उगाने की जहमत क्यों उठाते। अब तो गिने चुने ताड़ के पेड़ ही गांव एवं आसपास के क्षेत्रों में दिखाई पड़ते है। बहरहाल इन पेड़ों के समाप्त होने से पहले से ही इनपर रहने वाले गिद्ध गायब होने लगे थे। 


शुरूआत में कोई ध्यान नहीं
शुरूआत में तो लोगों ने इसपर कोई खास ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया। गिद्धों के दर्शन तक मुश्किल हो गए। तब लोगों ने ये सोचना शुरू किया कि आखिर ये गिद्ध गए तो कहां गए। गिद्धों का गायब होना साफ दर्शाता था कि क्षेत्र में कोई बड़ा बदलाव आया है, जिससे ये गिद्ध अब यहां नहीं रहे, बल्कि कहीं और चले गए या फिर इनकी मौत हो गई। अनुमान लगाया गया कि शायद अब बैलों की जगह खेती में ट्रैक्टर का इस्तमाल होने लगा है। इसके चलते लोगों ने बैल पालने ही बंद कर दिए। बात सही भी लगती है। क्योंकि अब मेरे गांव में आपको बैल देखने हो तो वे ढूढने से भी नहीं मिलेंगे। 

मशीनीकरण ने बदली तस्वीर 
यहां लगभग शत प्रतिशत खेती अब आधुनिक उपकरणों से जैसे ट्रैक्टर, हार्वेस्टर आदि से की जाने लगी है। रबी हो या खरीफ पहले कई कई दिनों तक खेतों में बैलों की जोड़ी खेतों की जोताई करते मैदानों की शोभा बढ़ाते थे। जो अब बंद हो चुका है। ये बात भी अजीब है कि खेती के साथ साथ पशुपालन जहां पहले अपना विशेष महत्व रखता था, अब ये सीमित हो चुका है। यहां कुछ लोगों में ही इसके प्रति जागरूकता है, जो पिछले कुछ वर्षो के दौरान ही फिर से देखने को मिली। लेकिन अब भी बैलों की जोड़ी नहीं दिखती है। पहले जहां पशुपालन खेती का हिस्सा होकर एक जरूरी संसाधन भी था, लेकिन अब ये सिर्फ निजी उपयोग, जिसके लिए कुछ लोगों के पास ही क्षमता है, और कुछ गिने चुने लोगों द्वारा बतौर बिजनेस के तौर पर उपयोग किया जा रहा है। 

एक का इलाज, दूसरे की मौत
पशुओं की घटती संख्या और इलाज की सुविधाओं ने जानवरों की मृत संख्या में कमी ला दी। साथ ही पशुओं के इलाज में उपयोग की जाने वाली एक खास दवाई गिद्धों के लिए प्राणघात साबित हुआ। पशुओं के मरने के बाद इस दवाई का कुछ अंश उनके शरीर में रहता हैं। और हम सब जानते हैं कि गिद्धों का प्रमुख भोजन ही जानवरों का मृत शरीर ही है। जब कोई गिद्ध इन्हें खाता है तो वो भी इस दवाई के चपेट में आ जाता है और इसके असर से वह धीरे-धीरे मौत के गाल में चला जाता है।

99 फीसद कम हो चुके हैं गिद्ध
अनुमान लगाया गया है कि 1952 से अबतक गिद्धों की तादाद में लगभग 99 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। वर्तमान दौर में विशेषज्ञों ने यह पता लगाया है कि पशु चिकित्सा में बुखार, दर्द एवं सूजन आदि के इलाज के लिए उपयोग की जाने वाली औषधि डाइक्लोफेनेक दवाई गिद्धों की संख्या में कमी लाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है। इसे ऐसे समझिए कि यदि किसी पशु का उपचार डाइक्लोफेनेक से किया जाए और जल्द ही उस पशु की मौत हो जाए। इसके बाद यदि गिद्ध उस पशु के शव को खाता है तो मांस के साथ डाइक्लोफेनेक औषधि उसके शरीर में प्रवेश कर जाता है। जो कि गिद्ध के शरीर में विषैला असर दिखाना शुरू कर देता है। डाइक्लोफेनेक गिद्ध के गुर्दे में गाउट नामक बीमारी को जन्म दे देता है। यह रोग गिद्धों के लिए बेहद प्राणघातक साबित होता है। गाउट रोग की चपेट में आए गिद्ध अपनी साधारण दैनिक गतिविधियों को त्याग देता है। अपनी गर्दन को नीचे लटकाकर शांत बैठा रहता है। ऐसा तबतक चलता है, जबतक कि उसकी मौत नहीं हो जाती है। मौत के बाद अपने बैठने की जगह से ही वो नीचे गिर पड़ता है।    

ठोस उपाए ही बचा है रास्ता
गिद्धों की संख्या में कमी आने के कारण जो भी हो अब यह पक्षी विलुप्ति के कगार पर खड़ा है, जिसे अब भी बचाया जा सकता है। इसके लिए ठोस उपाए की जरूरत है। ऐसा नहीं किया गया तो गिद्ध भी डोडो पक्षी की तरह सिर्फ किताबों में ही सीमित रह जाएगा। हम सभी को इस विषय में जरूर सोचना चाहिए। गिद्धों के प्रजनन एवं पुनर्वास पर खास जोर देना चाहिए। साथ ही ऐसी कोई भी औषधि या गतिविधि जिससे इस पक्षी को नुकसान पहुंच रहा हो उसको लेकर नई रणनीति तय करनी होगी। नहीं तो एक दिन इस प्राकृतिक अपमार्जक पक्षी को पूरी तरह से गायब होने से नहीं बचाया जा सकेगा।