सुबह अखबार की एक खबर पर नजर पड़ी, जो सिटी पेज के सबसे पहले पन्ने पर लीड थी। खबर बड़ी दिलचस्प लगी। "शहर में 20 हजार कुत्तों की होगी नसबंदी" हेडिंग लगी थी। खबर की हेडिंग से ही कुत्तों के प्रति लिए गए निर्णय का आभास हो गया। सोचा कि ऐसी कौन सी नौबत आ गई कि शहर में कुत्तों की नसबंदी की जाएगी, वो भी एक वृहद अभियान चलाकर इस काम को अंजाम दिया जाएगा। जिज्ञासा जगी तो पूरी खबर ही पढ़ ली। पूरी खबर पढ़ने पर पता चला कि इस अभियान के लिए प्रदेश भर के नगर निगमों को 10 करोड़ रुपए का आवंटन भी किया गया है। और प्रत्येक नगर निगम को इसके लिए लक्ष्य भी निर्धारित कर दिया गया है। खबर में ये पढ़कर कि कुत्तों की संख्या इतनी ज्यादा है कि उनके काटने के बाद लगने वाले एंटी रैबीज इंजेक्शनों की किल्ल्त होने लगी है। बड़ा आश्चर्य हुआ। बहरहाल, ये समस्या सिर्फ एक शहर की नहीं है, बल्कि ज्यादातर महानगरों में भी कुछ यही हालात हैं।
शहर हो या गांव गलियों में कुत्ते हमेशा चहल कदमी करते नजर आते हैं। रात में अक्सर उनके बीच अपने-अपने क्षेत्र को लेकर होने वाली लड़ाइयों के शोर अक्सर सुनने को मिलता है। कई दफा तो शोर इतना ज्यादा करते हैं कि लोगों का सोना मुश्किल हो जाता है। मजबूर होकर लोगों को न चाहते हुए भी अपने बिस्तर से उठकर उन्हें भगाना पड़ता है। हां दूर से ही। नजदीक जाने का खतरा कोई मोल नहीं लेता। जिन गलियों में कुत्तों का डेरा होता है, वहां से रात में गुजरना किसी मुसीबत से कम नहीं होता है। अगर कोई अंजान व्यक्ति हो, जो वहां का रहने वाला नहीं है, तो ये कुत्ते उसके पीछे ऐसे पड़ते हैं कि वह व्यक्ति दोबारा उस गली से गुजरने से पहले सौ बार सोचता है। कई बार ये भी देखने को मिलता है कि आसपास रहने वाले लोगों को यें कुत्ते आसानी से पहचान लेते हैं और कितनी भी रात में, चाहे अकेले ही क्यों न हो, कुत्ते एक बार भी भोंकते नहीं हैं। लेकिन अजनबियों के साथ उनका ये रवैया ठीक उलटा ही होता है। बहरहाल, शहरों की लगभग हर गली में कुत्तों का कोई न कोई झुंड जरूर मुस्तैद रहता है।
अक्सर इनके बढ़ते झुंड से कई खतरे भी उभर कर सामने आने लगते है। आपने भी अखबारों में कुत्तों के हमले में घायल लोगों की तस्वीरों वाली खबर पढ़ी होगी। कई बार बच्चे भी इनके निशाने पर आ जाते हैं। लोगों की समस्याएं जब बढ़ती है तो जिम्मेदार इन्हें पकड़ने का अभियान चलाते है। इन्हें पकड़कर दूर दराज के क्षेत्रों में छोड़ दिया जाता है। जहां से ये दोबारा अपने शहर या किसी दूसरी जगह पर अपना ठिकाना बना लेते हैं। इन्हें सर्वाइव करने में तो कोई खास दिक्कत नहीं होती है। जो मिले उसी में गुजारा कर लेते हैं। न बिस्किट की डिमांड, न ही किसी दवा दारू की। जो भी रूखा सूखा मिला खा पीकर मस्त हो गए। लेकिन कई बार ये बड़ा खतरा भी बन जाते हैं। जिससे लोगों को इनके हमलों से इतनी परेशानी होती है कि वे प्रशासन से नाक भौं सिकोड़ लेते हैं।
यूपी के बड़े शहर कानपुर की ही बात करें तो यहां पर लगभग 50 हजार आवारा कुत्ते है। जैसा कि खबर में छपा था। हालांकि ये इससे भी ज्यादा हो सकते हैं। अब इनसे लोगों की परेशानी इतनी बढ़ गई है कि ये रोज कइयों को काटकर घायल कर देते हैं। इनमें बच्चे भी शामिल होते हैं। कई लोग आसपास के अस्पतालों में अपना इलाज कराने सहित एंटी रैबीज के इंजेक्शन लगवा लेते हैं। कई लोग इनके हमलों के बाद घायल होकर सरकारी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं। जिसके आधार पर कुत्ता काटने के मरीजों की संख्या की असली तस्वीर का आंकलन किया जाता हैं। जो वास्तविकता से कहीं अधिक होती है। कुत्तों के काटने से अस्पतालों में एंटी रैबीज के इंजेक्शन कम पड़ने लगते है। इससे कई मरीजों को बाजार से महंगी कीमतों पर एंटी रैबीज इंजेक्शन लेने को विवश होना पड़ता होगा।
कानपुर में तो आवारा कुत्तों की नसबंदी के लिए बकायदा 20 लाख रुपए खर्च कर एक अस्पताल को व्यवस्थित कराया जा रहा है। एक महीने में सभी कार्य दुरुस्त करा लेने को कहा गया है। ताकि नसबंदी का यह अभियान कहीं फिर से फेल न हो जाए। पहले भी कुत्तों के बढ़ते हमले को देखते हुए इस प्रकार के निर्णय लिए गए थे, लेकिन ये हमेशा फ्लाप ही साबित हुए। स्थिति ये रहती है कि एक साल में 365 कुत्तों की भी नसबंदी नहीं हो पाई। अब फिर से नसबंदी का बीड़ा उठाया गया है। अभियान सफल रहा तो कई शहरों में लोगों को राहत मिलेगी। लेकिन पुराने रिकाॅर्ड को देखते हुए अभियान के सफल होने को लेकर अभी संशय के बादल ही मंडराते दिख रहे हैं।
फिलहाल आप रात में सुनसान सड़कों पर निकले तो कुत्तों से होशियार रहिएगा। कभी भी ये हमला कर सकते हैं। क्योंकि अभी तो अभियान शुरू नहीं हुआ है। अभियान शुरू भी हो गया तो नसबंदी के बाद कुत्ते काटना नहीं छोड़ते। हां, इतना जरूर है कि इस अभियान के सफल होने पर कुछ समय बाद जरूर ही लोगों को आवारा कुत्तों से निजात मिलेगी। अभी तो सोते जागते इनकी गुर्राहट को बर्दाश्त करिए। इनके काटे जाने से बचकर रहिए। क्योंकि अब तो अस्पतालों में एंटी रैबीज इंजेक्शनों की कमी की बात भी पता चलने लगी है। ऐसा न हो कि आप घायल होकर अस्पताल पहुंचे और वहां दर्जनों घायल आपसे पहले नंबर लगाए खड़े हों। जब आपका नंबर आए तो पता चले कि... क्या करें भइया इतने मरीज आ गए थे कि इंजेक्शन ही खत्म हो गया। अब कब आएगा पता नहीं...।

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