देश में बोतलबंद पानी का कारोबार 8 हजार करोड़ रुपए के करीब है। बढ़ती मांग और आसानी से इसकी उपलब्धता ने इस कारोबार को तेजी ये बढ़ाया है। आने वाले समय में ये और बढ़ेगा ही। सवाल ये है कि हम इतना ज्यादा बोतलबंद पानी क्यों पीने लगे हैं, जबकि नलों, हैंडपंप एवं सब मर्सिबल पंप्स का पानी भी सुरक्षित होता है, जबतक कि वह स्वीकृत मानक के मुताबिक रहता है।


पानी हम सभी के लिए जरूरी है। पानी का शुद्ध और सुरक्षित होना भी इतना ही जरूरी है। लेकिन पानी शुद्ध है या नहीं ये हम कैसे पता करते हैं। अधिकतर को ये बात पता ही नहीं होता कि उनके घरों में आने वाला पानी शुद्ध व सुरक्षित है कि नहीं। शहरी हो या ग्रामीण क्षेत्र, हर जगह घरों में पानी के बेहतर संसाधन उपलब्ध कराने पर जोर रहता है। जैसे कि हैंडपंप, नल, सब मर्सिबल पंप आदि। इसके बाद भी अब हम बोतलबंद पानी को पसंद करने लगे हैं। क्या नलों या हैंडपंप से आने वाला पानी खराब है। या हम सिर्फ शौक के लिए ही बोतलबंद पानी को तरजीह दे रहे हैं।

कई तो ये भी नहीं जानते कि उनके घर में लगा हैंडपंप या सब मर्सिबल से आने वाला पानी भी शुद्ध व सुरक्षित है। लेकिन दूसरे की देखा देखी या स्वाद के लिए बोतलबंद पानी का उपयोग करने लगे हैं। जबकि नलों या सब मर्सिबल का पानी मानक के अनुरूप है तो उसे पिया जा सकता है। इन्हें छोड़कर बोतलबंद पानी के लिए ज्यादा खर्च करने लगे हैं। यह जरूर है कि टीवी एवं अन्य माध्यमों से पानी के विभिन्न ब्रांडों के प्रचार प्रसार ने हमारी इन आदतों में इजाफा किया है।

अब हम कहीं भी सफर पर जाते हैं तो बोतल बंद पानी की जरूरत महसूस करने लगे हैं। इसके बिना सफर अधूरा अधूरा सा लगता है। पहले लोग खासकर मध्यम वर्ग के लोग पानी की व्यवस्था घर से ही करके जाते थे। वे पानी की बोतल घर से साथ में ले जाते थे। अभी भी कई लोग ऐसा करते हैं। लेकिन अब स्थिति बदलने लगी है। लोग बोतलबंद पानी खरीदकर पीना ही बेहतर समझने लगे हैं। रेल से सफर होने पर रेलवे स्टेशन, बस से सफर करने पर बस स्टैंड पर सबसे ज्यादा बिक्री बोतलबंद पानी की ही होती है।

अब तो रेलवे स्टेशनों पर कम कीमत में आरो वाॅटर की सुविधा मुहैया है। भले ही इनकी संख्या अपेक्षा से कम है। पानी के इन बूथों पर बोतल की भी सुविधा रहती है। हां, ये भी प्लास्टिक के ही होते हैं। रेलवे स्टेशनों पर नलों का भी पानी उपलब्ध रहता है। जिसे अक्सर खराब समझने की गलती की जाती है। क्या वास्तव में ऐसा ही है। जवाब होगा कि नहीं। रेलवे स्टेशनों पर मौजूद नलों का पानी भी पीने के लिए बेहतर है। इनमें मानक को ध्यान रखा जाता है। फिर भी धीरे-धीरे लोग इसका उपयोग हाथ मुंह धोने में ही ज्यादा करने लगे हैं। इसे देख अन्य यात्री भी ऐसा करने लग जाते हैं।

आफिस की मीटिंग हो या रेस्टारेंट हर जगह अब बोतलबंद पानी का ही बोलबाला है। कोई भी मीटिंग अब बिना बोतलबंद पानी के पूरा ही नहीं होता है। आलम ये है कि शादी ब्याह में जितना जोर कम खर्च पर दिया जाता है, अब लोग उतना ही ज्यादा खर्च करने पर तुले रहते हैं। समारोहों में अब पहले जैसा नल या हैंडपंप का पानी उपयोग कम ही होता है। यहां भी बोतलबंद पानी या आरो वाॅटर का उपयोग बढ़ रहा है। इतना भी खराब नहीं होता है हैंडपंप, नल या सब मर्सिबल का पानी।

अब घर हो या आफिस, बड़े बोतलों में रोजाना पानी मंगाया जाता है। यह प्रवृत्ति बढ़ रही है। ज्ञात रहे, आरो या फिल्टर वाॅटर प्राप्त करने में दो तिहाई पानी व्यर्थ हो जाता है। सामान्यतः आरो प्लांट से दो धाराएं निकलती हैं। एक साफ पानी और दूसरा जिसमें अशुद्धियां रहती हैं। अशुद्धियों से भरे पानी का शायद ही कहीं पर सही उपयोग होता हो।

बहरहाल, ये भी सही है कि कई जगहों पर नलों, हैंडपंप, सब मर्सिबल का पानी मानक के अनुसार नहीं होता है। इससे भी बोतलबंद पानी को बढ़ावा मिला है। लेकिन कभी अपने सबमर्सिबल पंप, नल या हैंडपंप के पानी की गुणवत्ता को चेक किया है। चेक कर लेना चाहिए। कमी हो तो बोतल बंद पानी पीने में कोई हर्ज नहीं है। और कमी नहीं है तो सिर्फ बोतल बंद पानी अपनाना ज्यादा पैसे खर्च करने के अलावा कुछ नहीं है। 

चलिए ये मान लेते हैं कि आपको बोतलबंद पानी की आदत है। जहां भी जाते हैं, यही बोतलबंद पानी ही पीते हैं। लेकिन आपको ये पता है कि बोतल बंद पानी का 50 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा नलों से ही आता है। मतलब ये है कि आधे से ज्यादा बोतल आम नलों के पानी से ही भरे गए होते हैं। उदाहरण के लिए रेलवे स्टेशनों पर अक्सर पानी की बोतल बेचने वाले कुछ अवैध वेंडर्स को देख लें, उनके पास मौजूद बोतल भी नया होगा और उसका ढक्कन भी सील होगा। लेकिन उनके पास मौजूद ज्यादातर बोतलों में भरा पानी नलों का ही होता है। कई अन्य जगहों पर भी देखने को मिलता है।

बोतलबंद पानी की कीमत आम नलों के पानी से कई सौ गुना महंगा होता है। हैंड पंप एवं सबमर्सिबल के पानी से तो ये और भी महंगा पड़ता है। घर का पानी शुद्ध है और पीने के लिए सुरक्षित भी है, इसको जाने बिना ही हम नया आरो लगवा लेते हैं। इसमें बिजली का खर्च और जुड़ जाता है। घर का पानी सफर पर नहीं ले जाने की बढ़ती प्रवृत्ति या बाहर नलों का पानी नहीं पीने की आदत खर्च में बढ़ावा करते हैं। ये सही कि जहां पर यह तय कर दिया गया है कि नलों का पानी पीने लायक नहीं है, वहां की बात कुछ और है। हैंडपंप और सब मर्सिबल पंप पर यही बात लागू होती है।

क्या आपको पता है, नलों का पानी यूं ही आपके घरों तक नहीं पहुंचता। बल्कि उसका कई बार परीक्षण करके ही सप्लाई होता है। नल के पानी की निगरानी की जाती है। मानकों को जांचा परखा जाता है। पानी में कुछ कमियां होती हैं तो उन्हें दूर किया जाता है। कुछ कमी होने पर पहले ही लोगों को आगाह करने की भी व्यवस्था है। हां, कभी कभी कभी नलों से गंदा पानी या कीड़ेयुक्त पानी आने की शिकायतें जरूस् मिलती हैं। लेकिन सिर्फ इसीलिए नलों के पानी को पीना छोड़कर बोतल बंद पानी पीने लग जाएं, ये ठोस आधार नहीं है।

कभी कभी नलों का या हैंडपंप का या सबमर्सिबल का पानी बेस्वाद भी लगता है। ऐसा अलग अलग जगहों पर महसूस किया जाता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पानी का बेस्वाद होना पानी की गुणवत्ता में कमी को दर्शाता है। या पानी खराब है और सेहत के लिए हानिकारक है। गौरतलब है कि पानी के स्वाद में परिवर्तन क्लोनीकरण या खनिज पदार्थों के चलते भी होता है।

ये भी जान लीजिए

पैकेज्ड वाॅटर या बोतलबंद पानी 
आम तौर पर पैकेज्ड वाॅटर को मिनरल वाॅटर समझने की भूल करते हैं। कभी जागरूक होने का प्रयास भी नहीं करते हैं। बोलचाल में भी दोनों में कोई अंतर नहीं समझा जाता। ध्यान रहे, पैकेज्ड वाॅटर आम तौर पर मिलने वाला बोतल बंद पानी है, जैसे रेलवे स्टेशनों या बस अडडों पर हम जो बोतलबंद पानी खरीदते हैं, वे पैकेज्ड वाॅटर के उदाहरण हैं।

पैकेज्ड वाॅटर नल से आने वाला सामान्य पानी ही होता है। इसे फिल्टर से छान लिया जाता है। विभिन्न प्रोसेस जैस रिवर्स आस्मोसिस से और स्वच्छ करके बोतलों में पैक किया जाता है। पानी में मिनरल या खनिजों का मिलाना कंपनियों पर निर्भर है। कुछ कंपनियां इनमें मिनरल मिलाती है और कुछ मिनरल मिलाने को लेकर उत्साह नहीं दिखाती हैं।

मिनरल या खनिज वाला पानी
मिनरल वाॅटर। यह कह सकते हैं ऐसा पानी जिनमें भरपूर खनिज तत्व पाए जाते हैं। यह आपको बाजारों में आम तौर पर बिकने वाली पानी की बोतल तरह बिकती हुई नहीं दिखती है। मिनरल वाॅटर ऐसे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त किया जाता है, जिसके पानी में कई लाभदायक खनिज तत्व पहले से ही मौजूद रहते हैं। इस पानी में और नल के पानी में काफी अंतर होता है। 

खनिज तत्वों से भरपूर पानी के ये प्राकृतिक स्रोत कोई झरना, झील, फव्वारा हो सकता है। जहां पर ये मौजूद होते हैं, वहां की मिट्टी और पत्थरों से मिले खास प्रकार लवणों एवं खनिजों से भरपूर यहां का पानी भी होता है। यह पानी स्वाद में काफी बेहतर होता है। आम पानी की तुलना में लाभदायक होता है। पैकेज्ड वाॅटर की तुलना में ये थोड़ा महंगा भी पड़ता है।

बोतलबंद और मिनरल में अंतर
आम तौर पर पैकेज्ड एवं मिनरल वाॅटर के बीच कोई अंतर नहीं समझा जाता है। लोग इसे एक दूसरे के पूरक के रूप में उपयोग करते हैं। जबकि ऐसा नहीं है। इनके बीच के अंतर को आप भी आसानी से पहचान सकते हैं। आपको मालूम होगा कि, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स भारत की मानक संस्था है।

संस्था हर क्षेत्र में विभिन्न मानक तय करती है। ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स की ओर से पैकेज्ड वाॅटर एवं मिनरल वाॅटर के लिए अलग अलग स्टैंडर्ड दिए गए हैं। जब भी आप कोई पानी का बोतल खरीदें तो इसपर गौर करिएगा कि जिस बोतल पर बीआईएस 14543 का मार्क है तो उससे यह समझिएगा कि वह एक पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर है। इसी तरह जिस पानी की बोतल पर बीआईएस 13428 का मार्क हो उसका मतलब यह होगा कि यह एक मिनरल वाॅटर है।

हम जानते हैं, नल से आने वाला पानी भी जमीन से ही आता है। लेकिन हर जगह पर जरूरी नहीं कि इनका स्वाद एक जैसा ही हो। स्थानों के बदलने के साथ साथ पानी का अपना अलग अलग स्वाद और गुणधर्म बदलता रहता है। खनिज जल या मिनरल वाॅटर का पानी थोड़ खास होता है, जो खास स्रोता से ही आता।

टीडीएस को भी जाने, ये है क्या
अब जरा टीडीएस पर भी गौर कर लीजिए। आखिर टीडीएस है क्या। और ये शब्द पानी के साथ क्यों सुना जाता है। आपकी जानकारी के लिए बता दें, टीडीएस का आशय कुल घुलित ठोस से होता है। पानी और मिट्टी में कई खनिज भी घुले रहते हैं। इसी पानी में घुले रहने वाले खनिजों को ही सामान्य तौर पर कुल घुलित ठोस या टीडीएस के नाम से जाना जाता है।

पानी में टीडीएस की मात्रा को मिलीग्राम लीटर या प्रति मिलियन टुकड़े (पीपीएम) से मापा जा सकता है। ये दोनों ही एक समान हैं। पानी में पाए जाने वाले खनिजों में मूलतः कैल्शियम (सीए), मैग्नीशियम (एमजी) और सोडियम (एनए) के विभिन्न अवयव पाए जाते हैं। आपको पता होनी चाहिए कि पानी में खारापन कैल्शियम और मैग्नीशियम के विभिन्न अवयव जैसे कैल्शियम या मैग्नीशियम क्लोराइड, कैल्शियम और मैग्नीशियम सल्फेट के चलते होता है।

वहीं, कम मात्रा के होने के बाद भी कुछ घुले हुए ठोस पदार्थ काफी खतरनाक भी होते हैं। उदाहरण के लिए आर्सेनिक, फ्लोराइड और नाइट्रेट। पानी में इन पदार्थों की स्वीकृत स्तर के कुछ तय मानक भी हैं। पानी में फ्लोराइड और आर्सेनिक जैसे हानिकारक केमिकल्स को छोड़ दें तो पीने के पानी में कुछ मात्रा में खनिजों का रहना जरूरी होता है। लेकिन इनकी मात्रा जरूरत से ज्यादा न हो। इसका ध्यान रखना चाहिए।

क्या कहते हैं टीडीएस मानक
टीडीएस के मानक भी तय हैं। आईए इसपर भी गौर करते हैं। देश में बीआईएस 10500-1991 मानक लागू हैं। इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन अर्थात डब्ल्यूएचओ के मानक के आधार पर तय किया गया है। इसमें समय समय पर बदलाव भी किए गए हैं। सामान्य तौर पर पीने के पानी में टीडीएस की मात्रा 500 एमजी प्रति लीटर से ज्यादा हो जाती है तो यह अरुचिकर हो जाता है।

बीआईएस मानक पेयजल की स्वीकार्य गुणवत्ता को तय करता है। बीआईएस मानक के अनुसार अधिकतम इच्छित टीडीएस की मात्रा 500 एमजी प्रति लीटर है। वहीं, पानी के बेहतर स्रोत की कमी होने पर अनुमन्य स्तर 2000 एमजी प्रति लीटर तक है। कैल्शियम कार्बोनेट का अधिकतम इच्छित स्तर 300 एमजी प्रति लीटर और अधिकतम अनुमन्य स्तर 600 एमजी प्रति लीटर है।

डब्ल्यूएचओ के मानक भी जानें
डब्ल्यूएचओ की ओर से भी पीने के पानी के लिए मानक निर्धारित किए गए हैं। इसके तहत 1000 एमजी प्रति लीटर से कम टीडीएस सघनता के स्तर वाले पानी को पीने के लिए उपयोग किया जा सकता है। हालांकि इसकी स्वीकार्यता में परिस्थितियों के अनुसार फर्क हो सकता है। टीडीएस के उच्च स्तर के कारण पीने के पानी का स्वाद बदल जाता है और ये पीने योग्य नहीं होता।

इसके अलावा उच्च टीडीएस स्तर वाले पानी से पाइप, घरेलू उपकरणों आदि के खराब होने का खतरा भी बढ़ जाता है। वहीं, बेहद कम टीडीएस सघनता वाला पानी का स्वाद भी फीका होता है। इस फीके स्वाद के चलते भी ये पीने लायक नहीं बचता।

पानी में बेहद कम टीडीएस
पानी में टीडीएस की मात्रा से पानी बेस्वाद तो होता ही है इसमें खनिजों की मात्रा भी काफी कम होता है। इससे भी कई तरह की समस्याएं खड़ी हो जाती हैं। गौरतलब है कि टीडीएस की मात्रा 80 एमजी प्रति लीटर से कम हो तो इस पानी को सामान्य तौर पर उपयोग के लिए अच्छा नहीं समझा जाता है।

हम टीडीएस को कैसे मापें 
अपने घरों में लगे हैंडपंप, सब मर्सिबल पंप या नलों से आने वाले पानी की टीडीएस को हम बेहद आसानी से माप सकते हैं। इसके लिए बाजार में टीडीएस मीटर उपकरण मौजूद है। जो सस्ता उपकरण है। जिसकी कीमत लगभग दो से ढाई हजार रुपए तक हो सकती है। इसका उपयोग कर आप आसानी से अपने घरों में मौजूद या आसपड़ोस में मौजूद कुंए, हैंडपंप, सब मर्सिबल, पैकेज्ड पानी सहित बारिश के पानी का भी टीडीएस माप सकते हैं।

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि बारिश के पानी का टीडीएस बुहत कम होता है। पानी के टीडीएस में होने वाला अचानक बदलाव हमें यह संकेत देता है कि अब पानी उच्च टीडीएस वाले पानी से प्रदूषित होने लगा है।